हौज़ा न्यूज़ एजेंसी के अनुसार , हौज़ा ए इल्मिया ईरान के प्रमुख आयतुल्लाह अली रज़ा आराफी ने इस्लाम की व्यापक चिंतन व्यवस्था और सामाजिक जीवन परियोजना के प्रशिक्षण कार्यक्रम के नाम जारी अपने संदेश में कहा,उन्होंने पैग़म्बरों और औलिया (अ.स.) की पाक आत्माओं, विशेष रूप से अंतिम पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा (स.ल.) और अंतिम वसी हज़रत वली-ए-अस्र (अ.ज.) की बारगाह में सलाम और दुरूद पेश किया। साथ ही इमाम ख़ुमैनी (रह.), इस्लाम, इस्लामी क्रांति, युद्ध और पवित्र रक्षा के महान शहीदों तथा विशेष रूप से शहीद नेता और इमाम की पाक आत्मा को श्रद्धांजलि अर्पित की।
उन्होंने प्रशिक्षण कार्यक्रम में शामिल शिक्षकों, फ़ुज़ला और छात्रों के साथ-साथ कार्यक्रम के आयोजकों और हौज़ा के तहज़ीबी एवं शैक्षिक विभाग के अधिकारियों का अभिवादन और आभार व्यक्त किया। यह कार्यक्रम हज़रत इमाम रज़ा (अ.स.) की पवित्र भूमि मशहद में उनके रौज़े के निकट आयोजित किया जा रहा है।
आयतुल्लाह आराफी ने कहा कि मेरी इच्छा थी कि मैं स्वयं इमाम रज़ा (अ.स.) की ज़ियारत और शहीद नेता के पवित्र मज़ार पर उपस्थित होकर सम्मान और आभार व्यक्त करूँ, लेकिन कुछ बाधाओं के कारण यह अवसर प्राप्त नहीं हो सका।
उन्होंने कहा कि हौज़ा के परिवर्तन, विकास, प्रगति और पूर्णता के लिए “प्रगतिशील और उत्कृष्ट हौज़ा” की दिशा में आगे बढ़ने की योजनाओं में “इस्लामी चिंतन की व्यापक व्यवस्था” परियोजना का महत्वपूर्ण स्थान है।
इस परियोजना का उद्देश्य विशेष रूप से उच्च स्तर पर अध्ययन करने वाले छात्रों को इस्लामी चिंतन की व्यापक व्यवस्था तथा धार्मिक और क्रांतिकारी ज्ञान की विशाल विचारधारा से परिचित कराना है। इसमें समकालीन हौज़वी विचारकों तथा इंक़ेलाब के दोनों नेताओं के महत्वपूर्ण बौद्धिक प्रयासों को सभ्यतागत और क्रांतिकारी दृष्टिकोण से प्रस्तुत किया गया है।
आयतुल्लाह आराफी ने कहा कि छात्र, शिक्षक और धर्मगुरु में व्यापक, सभ्यतागत और जीवनदायी चिंतन की कमी या कमजोरी एक गंभीर नुकसान है, जिसकी उपेक्षा नहीं की जानी चाहिए। “इस्लामी चिंतन की व्यापक व्यवस्था”, “तरहे विलायत” तथा शहीद मुर्तज़ा मुतह्हरी (रह.) की रचनाओं के अध्ययन जैसी परियोजनाओं का उद्देश्य इसी कमी को दूर करना है।
उन्होंने कहा कि वास्तव में हम लंबे समय से इस्लाम, पैग़म्बरे इस्लाम (स.ल.) और उनके पवित्र अहले-बैत (अ.) की महान शिक्षाओं की अधूरी व्याख्याओं, सीमित दृष्टिकोणों, गैर-सभ्यतागत अध्ययनों और आंशिक विचारों का सामना करते रहे हैं।
हालांकि आधुनिक दौर में इमाम ख़ुमैनी (रह.), शहीद इमाम ख़ामेनेई (रह.), अल्लामा तबातबाई (रह.), शहीद मुहम्मद बाक़िर सद्र (रह.), उनके प्रमुख शिष्यों और हौज़ा के अन्य महान विद्वानों ने इस्लाम के संबंध में व्यापक और सभ्यतागत दृष्टिकोण अपनाया तथा इस्लाम की एक जीवंत, जीवनदायी और आंदोलन पैदा करने वाली व्याख्या प्रस्तुत की।
उन्होंने कहा कि यह विचार व्यवहारिक रूप से महान इस्लामी क्रांति के रूप में सामने आया, जिसने एक नई दुनिया की नींव रखी। उन्होंने उम्मीद जताई कि अल्लाह की कृपा से वरिष्ठ रहबर, महान मरजा-ए-तक़लीद, विचारकों और हौज़ा के महान विद्वानों के मार्गदर्शन में यह ज्ञान और बौद्धिक आंदोलन ईरान और पूरी दुनिया में जारी रहेगा।
अंत में आयतुल्लाह आराफी ने विद्वानों और हौज़वी वर्ग, विशेष रूप से युवा छात्रों, फ़ुज़ला तथा हौज़ा और इस्लामी क्रांति के भविष्य के पूंजी समान युवाओं से अपील की कि वे ऐसे रणनीतिक मुद्दों, परिवर्तनकारी योजनाओं और “इस्लामी चिंतन की व्यापक व्यवस्था” जैसे कार्यक्रमों तथा ज्ञान और अंतर्दृष्टि के विकास पर विशेष ध्यान दें।
उन्होंने कहा कि इसके साथ-साथ व्यावहारिक क्षेत्र में भी सक्रिय भूमिका निभाते हुए सांस्कृतिक, सामाजिक, प्रचारात्मक और जनसामान्य से संबंधित अपनी जिम्मेदारियां निभानी चाहिए।
उन्होंने अंत में सभी के लिए इस पवित्र मार्ग और कठिन यात्रा में सफलता की दुआ की तथा उम्मीद जताई कि सभी लोग इमाम रज़ा (अ.स.) और हज़रत वली-ए-अस्र (अ.ज.) की विशेष कृपा से लाभान्वित होते रहेंगे।
अली रज़ा आराफी
प्रमुख, हौज़ा-ए-इल्मिया
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